(कवित्त)
अति अलबेली भाँति झूलैं अलबेली प्रिये,
सहज छबीली छबि नवल निहारहिं। [1]
सारी सुही सुरंग परत खसि खसि सखी,
बार बार प्यारौ पिय फूल सों सँवारहीं॥ [2]
जेही ओर अंग पट भूषण खिसत पिय,
तेहिं ओर मुरि मुरि प्राण ज्यौं संभारहिं। [3]
हित ध्रुव प्रीतम के नाहिं और दूजी गति,
छिन छिन तिनहीं के सुखही विचारहीं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (35)
आज अलबेली प्रिया अलबेले ढंग से हिंडोले में झूल रही हैं, जिनकी सहज छबीली छवि को रंगीले नवल लाल देख-देखकर निहाल हो रहे हैं। [1]
उनकी चटकीले रंग की साड़ी जब-जब फिसलती है, प्राणप्रिय प्रियतम बड़े चाव से उसे बार-बार सँभाला करते हैं। [2]
उनके श्रीअंग के वस्त्र और अलंकार जब-जब शिथिल होकर अपने स्थान से ढलक जाते हैं, तब-तब प्रियतम उन्हें मुड़-मुड़कर सावधानी से प्राणों की भांति यथास्थान विराजित करते हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रेमासक्त प्रियतम निरंतर प्रिया के सुख का ही चिंतन करते रहते हैं; इसके अतिरिक्त उनकी और कोई गति ही नहीं है। [4]
अति अलबेली भाँति झूलैं अलबेली प्रिये,
सहज छबीली छबि नवल निहारहिं। [1]
सारी सुही सुरंग परत खसि खसि सखी,
बार बार प्यारौ पिय फूल सों सँवारहीं॥ [2]
जेही ओर अंग पट भूषण खिसत पिय,
तेहिं ओर मुरि मुरि प्राण ज्यौं संभारहिं। [3]
हित ध्रुव प्रीतम के नाहिं और दूजी गति,
छिन छिन तिनहीं के सुखही विचारहीं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (35)
आज अलबेली प्रिया अलबेले ढंग से हिंडोले में झूल रही हैं, जिनकी सहज छबीली छवि को रंगीले नवल लाल देख-देखकर निहाल हो रहे हैं। [1]
उनकी चटकीले रंग की साड़ी जब-जब फिसलती है, प्राणप्रिय प्रियतम बड़े चाव से उसे बार-बार सँभाला करते हैं। [2]
उनके श्रीअंग के वस्त्र और अलंकार जब-जब शिथिल होकर अपने स्थान से ढलक जाते हैं, तब-तब प्रियतम उन्हें मुड़-मुड़कर सावधानी से प्राणों की भांति यथास्थान विराजित करते हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रेमासक्त प्रियतम निरंतर प्रिया के सुख का ही चिंतन करते रहते हैं; इसके अतिरिक्त उनकी और कोई गति ही नहीं है। [4]

