नित मेरौ लालन नित ही लली - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, , अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.1)

नित मेरौ लालन नित ही लली - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, , अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.1)

(राग विभास)
नित मेरौ लालन नित ही लली।
नित्य बिहार, नित्य वृन्दावन, नित नये कौतुक करहिं अली ॥ [1]
नित नयौ नेह, नित्य नयौ जोबन, नित नयौ तौल नवल नवली।
नित नये स्याम होत हैं स्यामाँ, नित नई स्यामाँ स्याम छली ॥ [2]
नित नये बसन, नित्य आभूषन, नित नये केसन कुसुम कली।
नित नये अंगराग, आलिंगन, नित नये भोजन भांति भली ॥ [3]
नित नये बना बनी बने दोऊ, नित नई भावै पुलिन थली।
नित नई सेज बनावत भगवत, केलि बिलोकत चित न चली ॥ [4]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.1)

(नित्य वृंदावन में प्रिया प्रियतम का नित्य बिहार निरंतर चलता रहता है फिर भी यह पुराना नहीं होता इसी रहस्य को स्पष्ट करते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं)

हमारे लाल जी नित्य हैं, हमारी लाडली भी नित्य हैं । इन दोनों का नित्य बिहार भी नित्य है और वह वृंदावन भी नित्य है जहां प्रेम सहेली (श्री हरिदास जी) लाडली लाल के लिए रस विलास के नित नए खेलों का आयोजन करती रहती है ।

इन नवल किशोर और नवल किशोरी जी का प्रेम भी नित नया है, यौवन भी नित नया है और नित्य नए ढंग से वे इस (प्रेम और यौवन) को तोला करते हैं । (इस तोलने में) श्यामा नित्य नए श्याम बनती रहती है और छलिया श्याम नित नई श्यामा । [2]

इन प्रिया प्रियतम के वस्त्र भी नित्य नवीन है, आभूषण भी नित्य नवीन है और केश पाश में गूँथी कुसुमकलियाँ भी नित्य नवीन हैं । इनके अंग अंग भी नित नये अनुराग के रंगों में रंगे रहते हैं, नित नये आलिंगन में बंधे रहते हैं और नित नये आस्वाद वाले रसों का यह भली-भांति भोग लगाया करते हैं । [3]

ये दोनों नित्य नवीन दूलह दुलहिन बने रहते हैं और यमुना पुलिन की नित्य नवीन विलास भूमि इन्हें नित्य नवीन रम्यता से आकृष्ट किए रहती है । भगवत रसिक जी ऐसे नित्य नवीन प्रिया प्रियतम के रस विलास हेतु नित्य नूतन सेज सजाया करते हैं और अचंचल चित्त से इनकी नित्य नवल रस केलियों का अवलोकन किया करते हैं । [4]