भृकुटी तनिकौ लट नागिनी - श्री देवजी

भृकुटी तनिकौ लट नागिनी - श्री देवजी

(कवित्त)
भृकुटी तनिकौ लट नागिनी फनी कौ देव,
प्यारे लखि नीकौ लगै फैल्यौ कंज फीकौ है। [1]
मैन कमनी को नैन बान की अनीकौ,
चौखै चैन रजनी कौ हौस हुलसनि नीकौ है॥ [2]
रूप रसनिकौ कहा रमा रमनी कौ,
गज गति गमनी कौ सीव जीव मुरनी कौ है। [3]
बैनी बन्दनी कौ रूख हास मन्दनी कौ,
मुख चन्द्र हूते नीकौ वृषभानु नन्दिनी कौ है॥ [4]

- श्री देवजी

कवि देवजी श्री राधा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब प्रभु आपकी उभरी हुई भौंहें और सर्प जैसी घुँघराली अलकों को देखते हैं, तो उन्हें आभास होता है कि आप पूरी तरह से खिले हुए कमल से भी अधिक अद्भुत हैं। [1]

आपकी प्रेमपूर्ण कलाएँ अत्यंत कुशल हैं, और आपके कटाक्ष के समक्ष तो कामदेव भी लज्जित हो जाता है। रात्रि के समय आपकी मधुर केलि लीलाओं का मनोहारी दृश्य मन को मोह लेता है। [2]

श्री हरि के लिए आपकी प्रेमविकलता को देखकर लक्ष्मी जी भी ललचाने लगती हैं। मदमस्त हाथी की भाँति आपकी गति को देखकर भगवान शिव, विष्णु और कामदेव भी मूर्छित होने लगते हैं। [3]

आपकी मधुर मुस्कान और आपकी वेणी में गुँथे हुए फूलों को देखकर यह कहा जा रहा है, “हे श्री वृषभानु जी की प्यारी बेटी, आप कोटि-कोटि चंद्रमाओं से भी अधिक सुन्दर हैं।” [4]