काहू को शरन शम्भु - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (1)

काहू को शरन शम्भु - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (1)

(कवित्त)
काहू को शरन शम्भु गिरिजा गणेश शेष,
काहू को शरन है कुबेर ऐसे घोरी कौ। [1]
काहू को शरन मच्छ कच्छ बलराम राम,
काहू को शरण गोरी साँमरौ सौ जोरी कौ॥ [2]
काहू को शरन बौद्ध वामन वराह व्यास,
यही निराधार सदाँ रहै मति मोरी कौ। [3]
आनंद शरण बिधि वंदित चरन एक,
हठी को शरन बृषभानु की किशोरी कौ॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (1)

कुछ लोग शिव, पार्वती, गणेश, या शेषनाग की पूजा करते हैं। कुछ लोग धन और धन के स्वामी कुबेर की पूजा करते हैं। [1]

कुछ भगवान के मत्स्य अवतार या कूर्म अवतार के प्रति समर्पित हैं, तो कुछ बलरामजी और कुछ रामजी की आराधना करते हैं। कुछ लोग देव-युगल आदि जोड़ी की शरण में हैं। [2]

कुछ लोग बुद्ध, वामन देव, वराह देव या व्यासदेव से प्रार्थना करते हैं, किंतु मेरी बुद्धि तो सदा इन सबका आधार छोड़कर एक ही में लगी रहती है। [3]

श्री हठीजी कहते हैं कि, "जिन चरण-कमलों की वंदना स्वयं ब्रह्मा जी करते हैं, वही आनंद के परम आश्रय, वृषभानु-नंदिनी श्री राधा, ही मेरी एकमात्र आश्रय हैं।" [4]