पापात्मा पुण्यवान् वा प्रसरदपयशाः कीर्त्तिमान वा महादु- ष्प्राप-ग्रासोऽथ सम्राड़समजड़मतिः सर्वविद्यानिधिर्वा।
यः कोऽपि स्याः सखे नो गणय कथमपीक्षस्व वृन्दावनं त- च्छिन्धि छिन्धि स्वपाशान् गुरुनिगमगिरा स्वीयमोहैकसिद्धान्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.68)
पापी या पुण्यात्मा, प्रसिद्ध अपकीर्त्ति या कीर्त्तिमान, महादरिद्र या महासम्राट, विषम जड़मति या सर्वविद्या-विशारद- तुम जो कुछ भी क्यों नहीं हो, हे सखे! तू इन में अपनी कुछ भी गणना मत कर। किन्तु जैसे भी हो उस श्री वृन्दावन के दर्शन कर, और गुरु एवं शास्त्राज्ञानुसार अपने मोह के मूल स्वरूप अपने बन्धनों को छेदन कर।
यः कोऽपि स्याः सखे नो गणय कथमपीक्षस्व वृन्दावनं त- च्छिन्धि छिन्धि स्वपाशान् गुरुनिगमगिरा स्वीयमोहैकसिद्धान्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.68)
पापी या पुण्यात्मा, प्रसिद्ध अपकीर्त्ति या कीर्त्तिमान, महादरिद्र या महासम्राट, विषम जड़मति या सर्वविद्या-विशारद- तुम जो कुछ भी क्यों नहीं हो, हे सखे! तू इन में अपनी कुछ भी गणना मत कर। किन्तु जैसे भी हो उस श्री वृन्दावन के दर्शन कर, और गुरु एवं शास्त्राज्ञानुसार अपने मोह के मूल स्वरूप अपने बन्धनों को छेदन कर।

