(राग देस उतरी)
अब विलम्ब जिन करहुँ लाड़िली कृपा दृष्टि टुक हेरो।
यमुना पुलिन गलिन गहवर की बिचरू साँज सवेरो॥
निसि दिन निरखूँ युगल माधुरी रसिकनते भव भेरो।
ललित किशोरी तन मन व्याकुल जीवन चरण बसेरो॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (२६)
हे प्यारी श्री किशोरीजू, कृप्या देरी न करें! प्रत्यक्ष मेरी ओर अनुग्रहपूर्ण दृष्टि करें। श्री यमुनाजी और श्री ब्रज के किनारे गह्वर वन में मैं बस लगातार भटकता रहूँ । फिर मैं निर्बाध रूप से श्री युगल किशोर की रूप माधुरी को निहारूँगा और मैं अपना सम्पूर्ण जीवन रसिक भक्तों के साथ बिताऊंगा । कवि ललित किशोरी कहते हैं “आप के लिए मेरा शरीर और मन पागल हो चुका है, हे स्वामिनी जू ,मुझे आप अपने श्री चरणों में रहने दीजिये ।"
अब विलम्ब जिन करहुँ लाड़िली कृपा दृष्टि टुक हेरो।
यमुना पुलिन गलिन गहवर की बिचरू साँज सवेरो॥
निसि दिन निरखूँ युगल माधुरी रसिकनते भव भेरो।
ललित किशोरी तन मन व्याकुल जीवन चरण बसेरो॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (२६)
हे प्यारी श्री किशोरीजू, कृप्या देरी न करें! प्रत्यक्ष मेरी ओर अनुग्रहपूर्ण दृष्टि करें। श्री यमुनाजी और श्री ब्रज के किनारे गह्वर वन में मैं बस लगातार भटकता रहूँ । फिर मैं निर्बाध रूप से श्री युगल किशोर की रूप माधुरी को निहारूँगा और मैं अपना सम्पूर्ण जीवन रसिक भक्तों के साथ बिताऊंगा । कवि ललित किशोरी कहते हैं “आप के लिए मेरा शरीर और मन पागल हो चुका है, हे स्वामिनी जू ,मुझे आप अपने श्री चरणों में रहने दीजिये ।"

