(कवित्त)
छुवत न रसिक रँगीलौ लाल प्यारी जूको,
मन हूके करनि सों छुवत डरत है। [1]
प्रेम की नौलासी प्यारी सहज ही सुकुमारी,
प्राणन की छाया तीन ऊपर करत है॥ [2]
नेंक ही के हास सखौ सार है बिलासन कौ,
जाके हैरे और सब सुख बिसरत है। [3]
अति ही आसक्त ताकी हितध्रुव यह गति,
रीझि रीझि दूर हीते पायन परत है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (43)
रसिक रंगीले प्रियतम श्री कृष्ण श्री प्यारी जू के कोमल अंगों का स्पर्श तन से तो क्या, मन के हाथों से भी करने की कल्पना नहीं कर पाते हैं। [1]
सहज सुकुमारि फूल-छड़ी सी कोमलाङ्गी प्राण-प्रिया पर वे सदैव अपने प्राणों की छाया किए रहते हैं। [2]
हे सखि! प्रिय-मुखकमल की तनिक सी मधुर मुस्कान भी समस्त रस-विलासों का सार है, जिसका दर्शन करके अन्य सब सुख विस्मृत हो जाते हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि अत्यन्त रूपासक्त किंवा प्रेमसक्त प्रियतम की यह स्थिति है कि वे दूर से ही सीधे हुए प्रिया के चरणों में निपतित होते रहते हैं । [4]
छुवत न रसिक रँगीलौ लाल प्यारी जूको,
मन हूके करनि सों छुवत डरत है। [1]
प्रेम की नौलासी प्यारी सहज ही सुकुमारी,
प्राणन की छाया तीन ऊपर करत है॥ [2]
नेंक ही के हास सखौ सार है बिलासन कौ,
जाके हैरे और सब सुख बिसरत है। [3]
अति ही आसक्त ताकी हितध्रुव यह गति,
रीझि रीझि दूर हीते पायन परत है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (43)
रसिक रंगीले प्रियतम श्री कृष्ण श्री प्यारी जू के कोमल अंगों का स्पर्श तन से तो क्या, मन के हाथों से भी करने की कल्पना नहीं कर पाते हैं। [1]
सहज सुकुमारि फूल-छड़ी सी कोमलाङ्गी प्राण-प्रिया पर वे सदैव अपने प्राणों की छाया किए रहते हैं। [2]
हे सखि! प्रिय-मुखकमल की तनिक सी मधुर मुस्कान भी समस्त रस-विलासों का सार है, जिसका दर्शन करके अन्य सब सुख विस्मृत हो जाते हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि अत्यन्त रूपासक्त किंवा प्रेमसक्त प्रियतम की यह स्थिति है कि वे दूर से ही सीधे हुए प्रिया के चरणों में निपतित होते रहते हैं । [4]

