(सवैया)
जिनके पग चाँपत नन्दलला, वेतो वेद प्रसिद्ध सुभायन में।
सुर तेतिसै कोटि की कोन गिने, जँह ब्रह्म रह्यो लपटायन में॥ [1]
कविलाल गुपाल की जीवन मूरि शशि कोटि की काँति प्रभा इनमें।
रहुरे मन तोसौं करों विनती, वृषभानु किशोरी के पायन में॥ [2]
- श्री लाल गोपाल जी
जिनके पग चाँपत नन्दलला, वेतो वेद प्रसिद्ध सुभायन में।
सुर तेतिसै कोटि की कोन गिने, जँह ब्रह्म रह्यो लपटायन में॥ [1]
कविलाल गुपाल की जीवन मूरि शशि कोटि की काँति प्रभा इनमें।
रहुरे मन तोसौं करों विनती, वृषभानु किशोरी के पायन में॥ [2]
- श्री लाल गोपाल जी
जिनके श्रीचरणों को भगवान श्रीकृष्ण सदा दबाते हैं (सेवा करते हैं), उन श्रीराधा के चरणों की महिमा अपरंपार है जो वेदों में विख्यात है। तैंतीस करोड़ देवताओं की तो गणना ही क्या है, जब स्वयं भगवान उन चरणों में लिपटे रहते हैं? [1]
कविलाल गोपालजी कहते हैं—वे श्रीचरण श्रीकृष्ण के प्राणों का आधार हैं। उनके नखों की ज्योति करोड़ों चंद्रमाओं की आभा को भी फीका कर देती है। हे मन! मैं तुझसे विनम्र निवेदन करता हूँ कि तू सदैव वृषभानु-किशोरी के चरणों में पूर्ण भाव से समर्पित रह। [2]
कविलाल गोपालजी कहते हैं—वे श्रीचरण श्रीकृष्ण के प्राणों का आधार हैं। उनके नखों की ज्योति करोड़ों चंद्रमाओं की आभा को भी फीका कर देती है। हे मन! मैं तुझसे विनम्र निवेदन करता हूँ कि तू सदैव वृषभानु-किशोरी के चरणों में पूर्ण भाव से समर्पित रह। [2]

