जाकौ मन वृन्दाविपिन हर्यौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (2)

जाकौ मन वृन्दाविपिन हर्यौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (2)

(राग गौरी)
जाकौ मन वृन्दाविपिन हर्यौ  ।
स्यामा-स्याम सरूप सरोवर, परि स्वारथ विसर्यौ ॥ [1]
निरषि निकुंज-पुंज छबि राधे, कृष्ण नाम उर धर्यौ ।
जै श्रीभट राधे रसिकराय, ताहि सर्बस दै निवर्यौ ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (2)
 
जिसके मन को श्री वृंदावन धाम रूपी आनन्दघन ने हरण कर लिया है वह स्वाभाविक रूप से युगल किशोर श्री श्यामा श्याम के रूप रस सागर में अपनी सुध बुध भूल कर डूब जाता है । [1]

निकुंज वन की लता पताओं में, श्री राधा रानी की दिव्य छबि को नित्य निहारना एवं ह्रदय में "कृष्ण" नाम स्वाभाविक धारण हो जाना । श्री भट्ट देवाचार्य कहते हैं "रसिकों में मुकुटमणि श्री राधा, जो अपने भक्तों पर कृपा बरसानेवाली हैं, उनकी सदा जय हो, अपना सर्वस्व उनके चरणों में समर्पित कर दीजिये" । [2]