प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारे ।
दूजे मोहनमदन, सनातन सुचि उर धारे ।।
तीजे गोपीनाथ, मधू हँसी कंठ लगाये ।
चौथे राधारमन, भट्ट गोपाल लड़ाये ।।
पाँचे हित हरिवंश, सु बल्लभ बल्लभ राधा।
छठवें जुगल किशोर, ब्यास सुख दियौ अगाधा ।।
सतयै श्री हरिदास के, कुंजबिहारी हैं तहाँ ।
भगवतरसिक अनन्य मिलि, बास करहु निधिवन जहाँ ।।
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (38)
भगवत रसिक जी साधकों से कहते हैं कि जिस वृन्दावन धाम में ये (निम्नलिखित) सात सिद्ध विग्रह विराजमान हैं, उसमें रसिक संतो की संगत करते हुए साधक को निवास करना चाहिए।)
1. श्री रुपगोस्वामी के प्राण प्यारे ठा० श्री गोविंद देव जी
2. ठा० श्रीमदनमोहन जी महाराज, जिन्हें श्री सनातन गोस्वामी ने सदा अपने पवित्र हृदय में विराजमान किया था
3. ठा० श्री गोपीनाथजी महाराज - जिन्हें प्रसन्न होकर श्री मधु गोस्वामी ने हृदय से लगाया था।
4. ठाकुर श्री राधा रमण जी महाराज, जिन्हें श्री गोपाल भट्ट जी ने लाड लडाया था।
5. श्रीहित हरिवंशजी के प्राणवल्लभ ठाकुर श्रीराधा वल्लभजी महाराज ।
6. ठाकुर श्रीयुगलकिशोरजी महाराज- जिनको व्यास जी ने अपार सुख प्रदान किया था ।
7. स्वामी श्रीहरिदास जी के नित्य निकुंजवन में विहार करने वाले ठाकुर श्रीबाँकेबिहारी जी महाराज और (उनकी प्राकट्य स्थली) निधिवन जहाँ पर हैं, वहाँ (सर्वोपरि श्री वृन्दावन धाम ) अनन्य रसिकों की संगत करते हुए अखंड वास करो।
दूजे मोहनमदन, सनातन सुचि उर धारे ।।
तीजे गोपीनाथ, मधू हँसी कंठ लगाये ।
चौथे राधारमन, भट्ट गोपाल लड़ाये ।।
पाँचे हित हरिवंश, सु बल्लभ बल्लभ राधा।
छठवें जुगल किशोर, ब्यास सुख दियौ अगाधा ।।
सतयै श्री हरिदास के, कुंजबिहारी हैं तहाँ ।
भगवतरसिक अनन्य मिलि, बास करहु निधिवन जहाँ ।।
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (38)
भगवत रसिक जी साधकों से कहते हैं कि जिस वृन्दावन धाम में ये (निम्नलिखित) सात सिद्ध विग्रह विराजमान हैं, उसमें रसिक संतो की संगत करते हुए साधक को निवास करना चाहिए।)
1. श्री रुपगोस्वामी के प्राण प्यारे ठा० श्री गोविंद देव जी
2. ठा० श्रीमदनमोहन जी महाराज, जिन्हें श्री सनातन गोस्वामी ने सदा अपने पवित्र हृदय में विराजमान किया था
3. ठा० श्री गोपीनाथजी महाराज - जिन्हें प्रसन्न होकर श्री मधु गोस्वामी ने हृदय से लगाया था।
4. ठाकुर श्री राधा रमण जी महाराज, जिन्हें श्री गोपाल भट्ट जी ने लाड लडाया था।
5. श्रीहित हरिवंशजी के प्राणवल्लभ ठाकुर श्रीराधा वल्लभजी महाराज ।
6. ठाकुर श्रीयुगलकिशोरजी महाराज- जिनको व्यास जी ने अपार सुख प्रदान किया था ।
7. स्वामी श्रीहरिदास जी के नित्य निकुंजवन में विहार करने वाले ठाकुर श्रीबाँकेबिहारी जी महाराज और (उनकी प्राकट्य स्थली) निधिवन जहाँ पर हैं, वहाँ (सर्वोपरि श्री वृन्दावन धाम ) अनन्य रसिकों की संगत करते हुए अखंड वास करो।

