तस्या अपार रस सार विलास मुर्ते: आनन्द कन्द पर्माद्भूत सौम्य लक्ष्म्याः।
ब्रह्मादिदुर्गम गतेर्वृषभानुजाया कैंकर्यएंव मम जन्मनि जन्मनि स्यात ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (39)
जो सभी रसों की सार हैं और जिनके रस विलास की सीमा की कोई कल्पना नहीं, जिनका मुख-कमल चंद्र की सुंदरता को लज्जित कर रहा है एवं जो मूर्तिमान मंगल स्वरूप हैं, ब्रह्मा आदि भगवान के लिए भी जिनके चरण नख की कांति को सहसा देख पाना संभव नहीं हैं, मुझे हर जन्म मे उन्हीं वृषभानु दुलारी श्री राधा की किंकरी बनने का परम सौभाग्य प्राप्त हो ।
ब्रह्मादिदुर्गम गतेर्वृषभानुजाया कैंकर्यएंव मम जन्मनि जन्मनि स्यात ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (39)
जो सभी रसों की सार हैं और जिनके रस विलास की सीमा की कोई कल्पना नहीं, जिनका मुख-कमल चंद्र की सुंदरता को लज्जित कर रहा है एवं जो मूर्तिमान मंगल स्वरूप हैं, ब्रह्मा आदि भगवान के लिए भी जिनके चरण नख की कांति को सहसा देख पाना संभव नहीं हैं, मुझे हर जन्म मे उन्हीं वृषभानु दुलारी श्री राधा की किंकरी बनने का परम सौभाग्य प्राप्त हो ।

