(कवित्त)
मुख छबि कान्ति सोहै उपमा चंद को है,
रहे मोहि जोहि जोहि नवल रसिक वर। [1]
शीश फूल शोभा कछु कहत न बानी आवै,
मनहु सुहाग छत्र झलकत है शीश पर॥ [2]
बेंदी लाल रही फबि कहा कहौं नथ छबि,
और सब रहै दबि जहाँ लगि दुति धर। [3]
हित ध्रुव नैननि मैं अंजन बिराजै खरौ,
चंचल चपल मन मोहन के चित्त हर॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (53)
जिस मुखछवि की कान्ति का दर्शन कर नवल रसिकराज कृतकृत्य हो जाते हैं, उसके लिए चंद्रमा की उपमा देना भी अपर्याप्त है। [1]
प्रिया के शीश पर सजे फूलों की शोभा अवर्णनीय है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके शिरोभाग पर सुहाग का दैवी छत्र झिलमिला रहा हो। [2]
ललाट पर सजी अरुण बिंदी की शोभा अनुपम है, और नासिका पर विराजित नथ की छवि अद्वितीय है जिसकी ज्योति के समक्ष सूर्य, चंद्रमा की द्युति भी फीकी पड़ जाती है। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि किशोरी जी के नेत्रों में अंजन की रेखा ऐसी शोभायमान है, जो परम चंचल मनमोहन के चित्त को पूरी तरह से आकर्षित कर लेती है। [4]
मुख छबि कान्ति सोहै उपमा चंद को है,
रहे मोहि जोहि जोहि नवल रसिक वर। [1]
शीश फूल शोभा कछु कहत न बानी आवै,
मनहु सुहाग छत्र झलकत है शीश पर॥ [2]
बेंदी लाल रही फबि कहा कहौं नथ छबि,
और सब रहै दबि जहाँ लगि दुति धर। [3]
हित ध्रुव नैननि मैं अंजन बिराजै खरौ,
चंचल चपल मन मोहन के चित्त हर॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (53)
जिस मुखछवि की कान्ति का दर्शन कर नवल रसिकराज कृतकृत्य हो जाते हैं, उसके लिए चंद्रमा की उपमा देना भी अपर्याप्त है। [1]
प्रिया के शीश पर सजे फूलों की शोभा अवर्णनीय है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके शिरोभाग पर सुहाग का दैवी छत्र झिलमिला रहा हो। [2]
ललाट पर सजी अरुण बिंदी की शोभा अनुपम है, और नासिका पर विराजित नथ की छवि अद्वितीय है जिसकी ज्योति के समक्ष सूर्य, चंद्रमा की द्युति भी फीकी पड़ जाती है। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि किशोरी जी के नेत्रों में अंजन की रेखा ऐसी शोभायमान है, जो परम चंचल मनमोहन के चित्त को पूरी तरह से आकर्षित कर लेती है। [4]

