रुददपि पितृमातृ-बन्धुपुत्रादिकमपहाय - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.82)

रुददपि पितृमातृ-बन्धुपुत्रादिकमपहाय - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.82)

रुददपि पितृमातृ-बन्धुपुत्रादिकमपहाय निशम्य नार्हदुक्तीः।
हृदि परमकठोरतां दधानो द्रुतमवलोकय कृष्णकेलिकुञ्जम्।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.82)

रोते हुए पिता, माता, बन्धु तथा पुत्रादिकों को भी त्याग कर, (तुम्हारे वृन्दावन जाने में यदि वे स्नेहवश रोते हैं) पूजनीय व्यक्तियों के वाक्यों को सुन ही मत, हृदय में परम कठोरता पोषण करते हुए श्रीवृन्दावन के दर्शन कर।