संतो, सेव्य हमारे श्रीपिय प्यारे, वृन्दाविपिन विलासी ।
नंदनँदन वृषभानुनंदनी, चरन अनन्य उपासी ॥ [1]
मत्त प्रणय बस सदा एकरस, बिबिध निकुंज निवासी ।
श्रीभट जुगल बंशीबट सेवत, मूरति सब सुखरासी ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (5)
हमारा सेव्य तत्व सदा ही एक मात्र वृन्दावन धाम है, जहाँ श्री युगल वर श्री नंदनंदन और श्री वृषभानु नंदननि नित्य वास करते हैं, उन युगल चरणों के ही हम अनन्य उपासक हैं। [1]
हम नित्य प्रति उन्मत्त रहने वाले, नित्य विहार के अनन्य प्रेम रस में डूबे हुए नित्य ही निकुंज महल में निवास करते हैं ।
श्री भट्ट देवाचार्य कहते हैं, "हम बंशीवट में, दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण की सेवा करते हैं, जो महाप्रेम समुद्र के मूर्तिमान स्वरुप हैं। [2]
नंदनँदन वृषभानुनंदनी, चरन अनन्य उपासी ॥ [1]
मत्त प्रणय बस सदा एकरस, बिबिध निकुंज निवासी ।
श्रीभट जुगल बंशीबट सेवत, मूरति सब सुखरासी ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (5)
हमारा सेव्य तत्व सदा ही एक मात्र वृन्दावन धाम है, जहाँ श्री युगल वर श्री नंदनंदन और श्री वृषभानु नंदननि नित्य वास करते हैं, उन युगल चरणों के ही हम अनन्य उपासक हैं। [1]
हम नित्य प्रति उन्मत्त रहने वाले, नित्य विहार के अनन्य प्रेम रस में डूबे हुए नित्य ही निकुंज महल में निवास करते हैं ।
श्री भट्ट देवाचार्य कहते हैं, "हम बंशीवट में, दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण की सेवा करते हैं, जो महाप्रेम समुद्र के मूर्तिमान स्वरुप हैं। [2]

