कृपा मैं जानी अब ब्रज भूप ।
लीनौं हरि गहि बाहु महाबल रति संश्रित भै कूप ॥ [1]
मिटि गये पाप संताप ताप तन चितवत स्याम सरूप ।
श्रीबिहारीदास गुन कहै कहाँ लौं उपमा अमित अनूप ॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जु, सिद्धान्त के पद (141)
श्री ब्रज धाम में वास करने के अद्भुत सुख को अनुभव करते हुए बिहारिन देव जु श्री बांके बिहारी जी को कह रहे हैं की "हे ब्रजभूप! आपकी मुझ पर कितनी कृपा है, इस बात को अब मैं भली-भांति जान गया हूँ।
मैं तो इस भय-भ्रमरूपी संसार के कुएं में ही रमा हुआ था और सुख मान रहा था परंतु आपने बलपूर्वक मेरे हाथ को पकड़ कर मुझे इस संसारी कुऍं से निकाल कर अपने चरणों में लगा लिया। [1]
आपके चिंतन से मेरे समस्त पाप, ताप, संताप भली-भांति मिट गए । श्री बिहारिन देव जु कह रहे हैं की “जिनके गुणों का वर्णन स्वयं वेद नहीं जान पाए हैं, सृष्टि में जिनकी कोई उपमा ही नहीं है, ऐसे आपके गुणों को मैं कहाँ तक वर्णन कर सकता हूँ।” [2]
लीनौं हरि गहि बाहु महाबल रति संश्रित भै कूप ॥ [1]
मिटि गये पाप संताप ताप तन चितवत स्याम सरूप ।
श्रीबिहारीदास गुन कहै कहाँ लौं उपमा अमित अनूप ॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जु, सिद्धान्त के पद (141)
श्री ब्रज धाम में वास करने के अद्भुत सुख को अनुभव करते हुए बिहारिन देव जु श्री बांके बिहारी जी को कह रहे हैं की "हे ब्रजभूप! आपकी मुझ पर कितनी कृपा है, इस बात को अब मैं भली-भांति जान गया हूँ।
मैं तो इस भय-भ्रमरूपी संसार के कुएं में ही रमा हुआ था और सुख मान रहा था परंतु आपने बलपूर्वक मेरे हाथ को पकड़ कर मुझे इस संसारी कुऍं से निकाल कर अपने चरणों में लगा लिया। [1]
आपके चिंतन से मेरे समस्त पाप, ताप, संताप भली-भांति मिट गए । श्री बिहारिन देव जु कह रहे हैं की “जिनके गुणों का वर्णन स्वयं वेद नहीं जान पाए हैं, सृष्टि में जिनकी कोई उपमा ही नहीं है, ऐसे आपके गुणों को मैं कहाँ तक वर्णन कर सकता हूँ।” [2]

