धन - धन वृन्दावन के कविजन।
वृन्दावन की लीला बरनत वाही में नित रहै लग्यो मन।।
- श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (12)
श्री वृंदावन धाम के रसिक कविजन धन्य हैं, जिन्होंने श्री जुगल किशोर की दिव्य लीलाओं को वाणी के रूप में वर्णन किया है, जो हमारे मन को उनसे (जुगल किशोर) से पूरी तरह से जोड़ देतीं हैं।
वृन्दावन की लीला बरनत वाही में नित रहै लग्यो मन।।
- श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (12)
श्री वृंदावन धाम के रसिक कविजन धन्य हैं, जिन्होंने श्री जुगल किशोर की दिव्य लीलाओं को वाणी के रूप में वर्णन किया है, जो हमारे मन को उनसे (जुगल किशोर) से पूरी तरह से जोड़ देतीं हैं।

