अनन्तैश्चिज्ज्योत्स्ना-रसजलधिपूरस्तत इतो - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.83)

अनन्तैश्चिज्ज्योत्स्ना-रसजलधिपूरस्तत इतो - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.83)

अनन्तैश्चिज्ज्योत्स्ना-रसजलधिपूरस्तत इतो, वहद्भिर्गोलोकावधि सकलसंप्लावनकरम्।
अहो सर्वस्योपर्यतिविमल विस्तीर्णमधुर-स्फुरच्चन्द्रप्रायं स्फुरति मम वृन्दावनमिदम्।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.83)

अननत चित् ज्योत्स्नामय रससमुद्र का प्रवाह इधर-उधर फैलकर गोलोक से अखिल (विश्व को) संप्लावित कर रहा है। यह श्रीवृन्दावन सबके ऊपर विराजमान होकर अति विमल विशाल मधुर चन्द्र के समान मेरे निकट प्रतिभाज हो रहा है।