[राग आसावरी]
बंदे, अखतियार भला।
चित न डुलाव, आव समाधि-भीतर, न होहु अगला॥ [1]
न फ़िर दर-दर पिदर-दर, न होहु अँधला।
कहिं श्रीहरिदास करता किया सो हुआ, सुमेर अचल चला॥ [2]
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (6)
परम रसिक स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज कहते हैं, “हे जीव! तुझे यह अनमोल मानव-देह अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य से प्राप्त हुआ है। अब अपने चित्त को संसार के व्यर्थ विषयों में भ्रमित मत होने दे। अपनी वृत्तियों को निरंतर श्रीश्यामा-कुंजबिहारी के श्रीचरणों में एकाग्र कर और अपनी हृदय-समाधि में ही उनके दिव्य विलास का दर्शन कर, क्योंकि यह अनिश्चित है कि काल का अगला क्षण तुझे उपलब्ध होगा भी या नहीं।” [1]
वे आगे सचेत करते हैं, “अरे अज्ञानी! जब तूने श्रीश्यामा-कुंजबिहारी की पावन शरणागति स्वीकार कर ली है, तब यह मानसिक भटकाव कैसा? तू क्यों अब भी पैतृक संपत्ति और संसार के नश्वर मोह-जाल में आबद्ध है? यह सत्य जान ले कि समस्त सृष्टि का भरण-पोषण केवल श्रीबिहारीजी ही करते हैं। यदि उनकी इच्छा हो, तो अचल सुमेरु-पर्वत भी चलायमान हो सकता है। जब सब कुछ श्री बिहारी जी के अधीन है, इसलिए उन्हें छोड़कर और किसी की शरण में क्यों भटकता है? [2]
बंदे, अखतियार भला।
चित न डुलाव, आव समाधि-भीतर, न होहु अगला॥ [1]
न फ़िर दर-दर पिदर-दर, न होहु अँधला।
कहिं श्रीहरिदास करता किया सो हुआ, सुमेर अचल चला॥ [2]
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (6)
परम रसिक स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज कहते हैं, “हे जीव! तुझे यह अनमोल मानव-देह अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य से प्राप्त हुआ है। अब अपने चित्त को संसार के व्यर्थ विषयों में भ्रमित मत होने दे। अपनी वृत्तियों को निरंतर श्रीश्यामा-कुंजबिहारी के श्रीचरणों में एकाग्र कर और अपनी हृदय-समाधि में ही उनके दिव्य विलास का दर्शन कर, क्योंकि यह अनिश्चित है कि काल का अगला क्षण तुझे उपलब्ध होगा भी या नहीं।” [1]
वे आगे सचेत करते हैं, “अरे अज्ञानी! जब तूने श्रीश्यामा-कुंजबिहारी की पावन शरणागति स्वीकार कर ली है, तब यह मानसिक भटकाव कैसा? तू क्यों अब भी पैतृक संपत्ति और संसार के नश्वर मोह-जाल में आबद्ध है? यह सत्य जान ले कि समस्त सृष्टि का भरण-पोषण केवल श्रीबिहारीजी ही करते हैं। यदि उनकी इच्छा हो, तो अचल सुमेरु-पर्वत भी चलायमान हो सकता है। जब सब कुछ श्री बिहारी जी के अधीन है, इसलिए उन्हें छोड़कर और किसी की शरण में क्यों भटकता है? [2]

