राधे देखि वन की बात - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (28)

राधे देखि वन की बात - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (28)

(राग बसंत)
राधे देखि वन की बात।
रितु बसंत अनंत मुकुलित कुसुम अरु फल पात ॥ [1]
बैनुं धुनि नँदलाल बोली, सुनीSब क्यौं अर सात ।
करत कतSब विलंब भामिनि वृथा औसर जात ॥ [2]
लाल मरकत मनि छबीलौ तुम जु कंचन गात ।
बनी श्री हित हरिवंश जोरी उभै गुन गन मात ॥ [3]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (28)

प्यारी राधे ! श्रीवृन्दावन की छटा तो देखो ! बसंत ऋतु अनन्त पुष्प फल और पत्रों से मुकुलित है-खिली हुई है। [1]

(ऐसे समय में) वेणु ध्वनि के द्वारा श्रीनन्द लाल ने तुम्हें बुलाया है फिर (तुम उस ध्वनि को सुनकर भी) आलस्य क्यों कर रही हो ?
हे भामिनी ! विलम्ब किस लिए कर रही हो, देखो (कैसा सुंदर) अवसर व्यर्थ जा रहा है ! [2]

श्रीहित हरिवंश चंद्र (सखी रूप से) कह रहे हैं- "अहा ! तुम दोनों की कैसी सुन्दर जोड़ी बनी है जो (दोनों ओर से) अनेक गुण समूह से मत्त है--परिपूर्ण है, जैसे श्रीलालजी मरकत मणि जैसे छविमय है वैसे ही तुम भी कनक वपु हो ।" [3]