"वाग् गद् गदा द्रवते यस्य चित्तं।
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद् गायति नृत्यते च।
मद् भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति।।"
श्रीमद भागवतमहापुराण - 11.14.24
श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं कि जिसकी वाणी मेरी चर्चा से ही गदगद हो जाती है, जिसका चित्त द्रवित हो जाता है, जो बार-बार रोने लगता है, कभी हँसने लगता है, कभी लज्जा छोड़कर उच्च स्वर से गाने लगता है, कभी नाचने लगता है, ऐसा मेरा भक्त समग्र संसार को पवित्र करता है।
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद् गायति नृत्यते च।
मद् भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति।।"
श्रीमद भागवतमहापुराण - 11.14.24
श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं कि जिसकी वाणी मेरी चर्चा से ही गदगद हो जाती है, जिसका चित्त द्रवित हो जाता है, जो बार-बार रोने लगता है, कभी हँसने लगता है, कभी लज्जा छोड़कर उच्च स्वर से गाने लगता है, कभी नाचने लगता है, ऐसा मेरा भक्त समग्र संसार को पवित्र करता है।

