कल्पलता के किधो पल्लव ये नवीन दोऊ - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (2)

कल्पलता के किधो पल्लव ये नवीन दोऊ - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (2)

(कवित्त)
कल्पलता के किधो पल्लव ये नवीन दोऊ,
हरण मञ्जुता के कंजता के वनिता के है। [1]
पावन पतित गुँण गावें मुनि ताके छबि,
छलै सविता के जनता के गुरुता के है॥ [2]
नऊ निधिता के सिधिता के आदि आलै हठी,
तीनों लोक ताके प्रभुता के प्रभु ताके हैं। [3]
कटैं पाप ताके बढ़ै पुण्य के पताके जिन,
ऐसे पद ताके वृषभानु की सुता के हैं॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (2)

श्री किशोरी जी के दोनों कोमल चरण युगल की छवि ऐसी हैं जैसे कल्पतरु वृक्ष के ताजे नए पत्ते हैं, जो इच्छा-पूर्ति करने वाले हैं और जो वन के कमल पुष्पों की सुंदरता को भी परास्त कर रहे हैं। [1]

वे चरण पतितों को पवित्र करने वाले और मुनियों के लिए स्तुति के विषय हैं जिनकी छवि सूर्य की आभा को तिस्करित कर रही है जो प्रजा की रक्षा और गुरुता का आदर्श प्रतीत होती है। [2]

श्री हठी कहते हैं कि नव निधियों और सिद्धियों के आदिस्रोत, तीनों लोकों की प्रभुता के आधार, तथा स्वयं परमेश्वर श्रीकृष्ण भी उन श्री चरणों की वंदना करते हैं ।  [3]

जो पापों को नष्ट करते हैं और पुण्य के पुंज को बढ़ाने वाले हैं। ऐसे हैं श्री वृषभानु दुलारी के युगल चरण । [4]