दुविधा तब जैहै या मन की।
निर्भय ह्वै कैं जब सेवहुगे रज श्रीवृन्दावन की।।
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (224)
मेरे मन की दुविधा तभी जाएगी जब मैं निर्भय होकर के इस वृंदावन रज का सेवन करूंगा।
निर्भय ह्वै कैं जब सेवहुगे रज श्रीवृन्दावन की।।
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (224)
मेरे मन की दुविधा तभी जाएगी जब मैं निर्भय होकर के इस वृंदावन रज का सेवन करूंगा।

