(राग नट)
राधा तेरे नैन किधों री बान।
यौं मारे ज्यौं मुरछि परै धर क्यों करि राखे प्रान॥
खग पर कमल कमल पर कदली कदली पर हठ ठान।
हरि पर सरवर सिर पर कलसा कलसा पर शशि भान॥
शशि पर बिंब कोकिला ता बिच कीर करत अनुमान।
बचि बचि दामिन दुति उपजत मधुप जूथ असमान॥
तू नागरि सब गुननि उजागर पूरन कला निधान।
सूरश्याम तब दरशन कारन व्याकुल परै अजान॥
- श्री सूरदास जी
हे श्री राधे, आपके नयन मानो बाणों के समान हैं। कोई यदि आपके तिरछे बाण देख लेता है वो तो धरती पर गिर जाता है मानो उसके प्राण ही चले जाते हैं। हे राधे, आपकी रूप माधुरी का तो क्या कहना, आपकी हंस जैसी चाल, कमल जैसे कोमल चरण, (चिकनी-चिकनी) कदली जैसी जह्व हैं, और कटि सिंह जैसी है। उदर पर गम्भीर नाभि कुण्ड है, उरज पवित्र कलश की भाँती, जिसके ऊपर चंद्रसम मुख विराजमान है। होठों में मानो ऐसी लालिमा छायी हुई है जैसे बिम्बा फल की लालिमा ही छीन ली गयी हो, उन होठों से कोकिला की भाँती मधुर स्वर निकलते हैं, नासिका मानो तोते की भाँती। मुख मानो बिजली समान है और केश मानो ऐसे हैं जैसे मधुप का झुण्ड मंडरा रहा हो। हे नागरी, आप समस्त गुणों की खान हो एवं और समस्त कला में निपुण हो। श्री सूरदास जी कहते हैं की श्री कृष्ण आपके दर्शन को ऐसे व्याकुल हैं मानो उनके प्राण निकल रहे हों।
राधा तेरे नैन किधों री बान।
यौं मारे ज्यौं मुरछि परै धर क्यों करि राखे प्रान॥
खग पर कमल कमल पर कदली कदली पर हठ ठान।
हरि पर सरवर सिर पर कलसा कलसा पर शशि भान॥
शशि पर बिंब कोकिला ता बिच कीर करत अनुमान।
बचि बचि दामिन दुति उपजत मधुप जूथ असमान॥
तू नागरि सब गुननि उजागर पूरन कला निधान।
सूरश्याम तब दरशन कारन व्याकुल परै अजान॥
- श्री सूरदास जी
हे श्री राधे, आपके नयन मानो बाणों के समान हैं। कोई यदि आपके तिरछे बाण देख लेता है वो तो धरती पर गिर जाता है मानो उसके प्राण ही चले जाते हैं। हे राधे, आपकी रूप माधुरी का तो क्या कहना, आपकी हंस जैसी चाल, कमल जैसे कोमल चरण, (चिकनी-चिकनी) कदली जैसी जह्व हैं, और कटि सिंह जैसी है। उदर पर गम्भीर नाभि कुण्ड है, उरज पवित्र कलश की भाँती, जिसके ऊपर चंद्रसम मुख विराजमान है। होठों में मानो ऐसी लालिमा छायी हुई है जैसे बिम्बा फल की लालिमा ही छीन ली गयी हो, उन होठों से कोकिला की भाँती मधुर स्वर निकलते हैं, नासिका मानो तोते की भाँती। मुख मानो बिजली समान है और केश मानो ऐसे हैं जैसे मधुप का झुण्ड मंडरा रहा हो। हे नागरी, आप समस्त गुणों की खान हो एवं और समस्त कला में निपुण हो। श्री सूरदास जी कहते हैं की श्री कृष्ण आपके दर्शन को ऐसे व्याकुल हैं मानो उनके प्राण निकल रहे हों।

