अनूपम, जोरी श्यामा श्याम।
इक सोरह सिंगार सजीं इक, नटवर भेष ललाम।।
गलबाहीं दै दोउ वृंदावन, विहरत आठों याम।
पुंज निकुंजनि मंजु रास – रस, खेलत पूरनकाम।।
सनक समाधि छाँड़ि सनकादिक, बने विटप ब्रजधाम।
आत्माराम ‘कृपालु’ श्याम की, आत्मा श्यामा नाम।।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (01)
श्यामा – श्याम की युगल जोड़ी सर्वथा अनुपमेय है | किशोरी जी ने अपना सोलह श्रृंगार कर रखा है एवं श्यामसुन्दर ने नटवर भेष बना रखा है | दोनों ही गलबाहीं दिये हुए वृन्दावन में निरन्तर विहार करते हैं | श्यामा – श्याम पूर्णकाम होते हुये भी सुन्दर लता कुंजों में रास रस खेलते हैं, जिसको देखने के लिये सनकादिक परमहंस अपनी समाधि की सनक छोड़कर ब्रज में वृक्ष बने हुए हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि आत्माराम ब्रह्म श्यामसुन्दर की आत्मा ही ‘श्यामा’ नाम से अलंकृत हैं |
इक सोरह सिंगार सजीं इक, नटवर भेष ललाम।।
गलबाहीं दै दोउ वृंदावन, विहरत आठों याम।
पुंज निकुंजनि मंजु रास – रस, खेलत पूरनकाम।।
सनक समाधि छाँड़ि सनकादिक, बने विटप ब्रजधाम।
आत्माराम ‘कृपालु’ श्याम की, आत्मा श्यामा नाम।।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (01)
श्यामा – श्याम की युगल जोड़ी सर्वथा अनुपमेय है | किशोरी जी ने अपना सोलह श्रृंगार कर रखा है एवं श्यामसुन्दर ने नटवर भेष बना रखा है | दोनों ही गलबाहीं दिये हुए वृन्दावन में निरन्तर विहार करते हैं | श्यामा – श्याम पूर्णकाम होते हुये भी सुन्दर लता कुंजों में रास रस खेलते हैं, जिसको देखने के लिये सनकादिक परमहंस अपनी समाधि की सनक छोड़कर ब्रज में वृक्ष बने हुए हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि आत्माराम ब्रह्म श्यामसुन्दर की आत्मा ही ‘श्यामा’ नाम से अलंकृत हैं |

