(दोहा)
भुवन चतुर्दस की सबै, सुंदरता सिरमौर।
भुवन चतुर्दस की सबै, सुंदरता सिरमौर।
सुंदर वर जोरी बनी, वृन्दावन निज ठौर॥
(पद) [राग-केदारौ, तीनताल]
वृन्दावन इक सुन्दर जोरी।
खेलत जहाँ तहाँ बंशीवट, नंदनँदन वृषभानु किसोरी।।
भुवन चतुर्दस की सुन्दरता, सुन्दर स्याम राधिका गोरी।
जै श्रीभट कहाँ लौं बरनौं, रसना एक नाहिं लख कोरी।।
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (58)
(दोहा)
श्रीवृन्दावन निजधाम में नित्य-विहार-परायण इस सुंदर जोड़ी के समक्ष चौदह भुवन का सौंदर्य भी गौण कोटि का लगता है।
(पद)
श्री वृंदावन धाम में एक अति ही सुंदर जोड़ी विराजमान है जो बंशीवट के निकट रमणीय स्थान पर केलि परायण विहरण करते हैं। उनमें से एक तो नंदनन्दन श्री श्यामसुंदर हैं और दूसरी वृषभानु दुलारी श्री किशोरी जु हैं। चौदह लोकों की संपूर्ण सुंदरता भी गौर वर्णा श्री राधा और सांवले सरकार श्री कृष्ण पर न्योछावर है। श्री भट्ट देवाचार्य कहते हैं "आखिरकार, किस सीमा तक मैं इसका वर्णन कर सकता हूँ, क्योंकि वृंदावन और दिव्य दंपति की महिमा का वर्णन करना असंभव है, भले ही मुझे अनन्त कोटि रसना (जीभ) क्यों ना प्राप्त हो जाए।"

