देखौ श्री वृन्दाविपिन प्रभाइ - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (30)

देखौ श्री वृन्दाविपिन प्रभाइ - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (30)

(राग धनाश्री)
देखौ श्री वृन्दाविपिन प्रभाइ।
सब तीरथ धामनि फिर आवत देखत उपजत भाई॥ [1]
श्रीजमुना तट लता भवन रज, छिन-छिन बाढ़त चाइ।
मगन होत जब सुधि-बुधि बिसरत, कहूँ चलत नहिं पाइ॥ [2]
यह रस चाखि और रस भूले, फूलत लखि मन अति घहराई।
अचरज कहा व्यास सुख वर्णत, थके रसिक ताहि गाई॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (30)

ओह सखी, श्री वृंदावन धाम की भव्यता और प्रभाव को देखो, यहां तक कि अन्य सभी तीर्थ भी यहीं आ गए हैं। [1]

श्री जमुना जी के तट पर लताओं के कुंजों और वृंदावन की रज की आकांक्षा क्षण प्रति क्षण बढ़ती जा रही है।
इस अद्भुत रस के चिन्तन में आसक्त और डूबे हुए होने के बाद, व्यक्ति अपने शरीर की जागरूकता खो देता है और गतिहीन हो जाता है। [2]

वृंदावन के इस अद्भुत रस को चखने के बाद जीव अन्य सभी आनन्द और रसों को भूल जाता है, और इस रस की गहराई में डूबते हुए उन्मत्त अवस्था को प्राप्त हो जाता है।
श्री हरिराम व्यास इस आश्चर्यजनक सर्वोच्च रस का वर्णन करते हैं, जिसे बहुत ही कम लोग जानते हैं एवं पाए हैं, जो रसिक संत गायन कर थक गए, वह रस श्री धाम वृंदावन में बरस रहा है । [3]