महल ते निकसी न बाहर आवैं, कुंज-कुंज प्रति खेल मचावें।
वन उपवन बाहर की लीला, नन्दकुमार करत तहाँ क्रीला।।
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी
वृंदावन रस एवं निज महल श्री राधा की सखियां, निज महल से बाहर नहीं जाती, वह कुंज कुंज में ही श्री राधा कृष्ण के संग खेल मचाती रहती हैं। जहां नन्द के कुमार रूप से लीलाएं हैं (श्री राधा के बिना), एवं वन, उपवन की उनकी और लीलाएं यह सब निज महल के बाहर की लीलाएं हैं।
वन उपवन बाहर की लीला, नन्दकुमार करत तहाँ क्रीला।।
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी
वृंदावन रस एवं निज महल श्री राधा की सखियां, निज महल से बाहर नहीं जाती, वह कुंज कुंज में ही श्री राधा कृष्ण के संग खेल मचाती रहती हैं। जहां नन्द के कुमार रूप से लीलाएं हैं (श्री राधा के बिना), एवं वन, उपवन की उनकी और लीलाएं यह सब निज महल के बाहर की लीलाएं हैं।

