भगवत स्यामाँ स्याम कौ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.11)

भगवत स्यामाँ स्याम कौ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.11)

भगवत स्यामाँ स्याम कौ, पाबक रूप बिहार।
नहिं समर्थ खगराज की, करै चकोर अहार।।
करै चकोर अहार, किलकिला जलचा पावै।
साहसीक मृगराज दसन तै आमिस लावै।।
ऐसैहिं रसिक अनन्य और न नागर खगवत।
सैध पराई तजौ, भजौ बित माफिक भगवत।।

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.11)

श्री भगवत रसिक जी कहते हैं की वृंदावन का नित्य विहार रस सर्वोपरि रस है और हर साधक इस रस का अधिकारी नहीं है।
पूर्व जन्मों के संस्कार और भावों की प्रबलता के अनुरूप अपने वर्त्तमान गति को दृष्टि में रखकर साधक को अपने परमार्थ के मार्ग का चयन करना चाहिए।
कोई किस प्रकार दो नावों पर आरूढ़ हो सकता है, इसलिए पहले अपने परमार्थ के मार्ग का चयन करे, फिर उसपर निष्ठा पूर्वक चलना चाहिए।
नित्य बिहार की उपासना को जाने बिना अधिकतर साधक जन इस उपासना में लग जाते हैं।
जिस साधक का मन विषय की ओर आसक्त है या रिद्धि-सिद्धि की ओर आसक्त है या स्वर्ग की इच्छा है या भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम की इच्छा हो या मुक्ति की आकांक्षा हो, तो उस साधक के लिए नित्य विहार की उपासना असंभव है।