जुगल ध्यान सीखै, सुनै, समुझै जो चित लाय।
ताहि रीझि "भगवत रसिक", लेत आप उर लाय॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक देव जी की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (25)
श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक श्रीयुगल के इस ध्यान को मन लगाकर सीखता, सुनता और समझता है, उन पर नित्यरसिक (श्रीप्रिया-प्रियतम अथवा स्वामी श्री हरिदासजी) रीझकर स्वयं अपने हृदय से लगा लेते हैं।
ताहि रीझि "भगवत रसिक", लेत आप उर लाय॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक देव जी की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (25)
श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक श्रीयुगल के इस ध्यान को मन लगाकर सीखता, सुनता और समझता है, उन पर नित्यरसिक (श्रीप्रिया-प्रियतम अथवा स्वामी श्री हरिदासजी) रीझकर स्वयं अपने हृदय से लगा लेते हैं।

