कोमल विमल मंजु कंज के अरुण सोहैं - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (3)

कोमल विमल मंजु कंज के अरुण सोहैं - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (3)

(कवित्त)
कोमल विमल मंजु कंज के अरुण सोहैं,
लच्छन समेत शुभ शुद्ध कंदनी के हैं। [1]
हरी के मनालय निरालय निराकारन के,
भक्ति बरदायक बखाने छन्दनी के हैं॥ [2]
ध्यावत सुरेश शम्भु शेष औ गणेश खुले,
भाग अवनीके जहाँ मन्द परै नीके है। [3]
कटै जन फंदनीय द्वंदनीय हरिहर,
वंदनीय चरण वृषभानु नन्दनी के है॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (3)

श्री राधा के चरण परम पवित्र, अति कोमल और अरुण वर्ण के हैं। उन श्री चरणों के लक्षण अति शुभ और परम पवित्र, नए कंदमूल की भांति प्रतीत हो रहे हैं। [1]

इन्हीं श्री चरणों के चिंतन में श्रीहरि का मन डूबा हुआ है, जो निराकार उपासकों को भी वरदान देने वाला है। [2]

भगवान शिव, गणेश और इंद्र भी इन्हीं श्री चरणों का चिंतन कर रहे हैं। इन श्री चरणों की रज कणिकाओं से वह धरती भी परम पवित्र हो गई है और धन्य हो गई है, जहाँ यह मंद गति से पधार रहे हैं। [3]

भगवान विष्णु और भगवान शिव समस्त जीवों को संसारिक बंधन और द्वंदों से मुक्ति प्रदान करते हैं, परंतु वे भी श्री वृषभानु दुलारी के श्री चरणों की वंदना कर रहे हैं। [4]