कब श्री वृन्दावन धरनि - श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (2)

कब श्री वृन्दावन धरनि - श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (2)

कब श्री वृन्दावन धरनि मैं, चरण परैगे जाय।
लोटि धूरि धरि सीस पै, कछु मुखहू में पाय॥

- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (2)

श्री वृन्दावन धाम की पवित्र भूमि पर चरण रखने का अवसर मुझे कब प्राप्त होगा? मैं उस रज में लोट जाऊँगा, कुछ अपने सिर पर धरूँगा और कुछ मुख में धारण करूँगा।