(राग विहाग व गौरी)
धन धन राधिका के चरन।
सुभग शीतल अतिसे कोमल कमल के से वरन॥
नख चन्द्रिका अनूप राजत विविध शोभा वरन।
कुन्नित नूपुर कुँज विहरत परम कौतुक करन॥
नन्द सुत मन मोद कारी, विरह सागर तरन।
दास परमानन्द छिन-छिन श्याम जाकी शरन॥
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (581)
श्री राधा जी के चरण धन्य हैं, वे अति ही सुंदर, शीतल, कोमल एवं मुलायम हैं, नए कमल की पंखुड़ियों की भांति गुलाबी वर्ण के हैं। पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति उनके चरण नख हैं, जो विविध रंगो को धारण किए हुए हैं। जब श्री राधा, कुंज में विहरण करती हैं, तो उनके चरणों के नूपुर आपस में टकराकर मधुर ध्वनि उत्पन्न करते हैं, जो श्री श्यामसुंदर के मन को मोह रहे हैं। यह मधुर ध्वनि, विरह सागर में डूबे हुए, श्यामसुंदर के लिए नौका है। श्री परमानन्द दास कह रहे हैं "श्री राधा के चरण मूर्तिमान रस स्वरूप हैं, जो श्री कृष्ण को आनंद प्रदान कर रहे हैं, जो हर क्षण उन्हीं चरणों की शरण में हैं।"
धन धन राधिका के चरन।
सुभग शीतल अतिसे कोमल कमल के से वरन॥
नख चन्द्रिका अनूप राजत विविध शोभा वरन।
कुन्नित नूपुर कुँज विहरत परम कौतुक करन॥
नन्द सुत मन मोद कारी, विरह सागर तरन।
दास परमानन्द छिन-छिन श्याम जाकी शरन॥
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (581)
श्री राधा जी के चरण धन्य हैं, वे अति ही सुंदर, शीतल, कोमल एवं मुलायम हैं, नए कमल की पंखुड़ियों की भांति गुलाबी वर्ण के हैं। पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति उनके चरण नख हैं, जो विविध रंगो को धारण किए हुए हैं। जब श्री राधा, कुंज में विहरण करती हैं, तो उनके चरणों के नूपुर आपस में टकराकर मधुर ध्वनि उत्पन्न करते हैं, जो श्री श्यामसुंदर के मन को मोह रहे हैं। यह मधुर ध्वनि, विरह सागर में डूबे हुए, श्यामसुंदर के लिए नौका है। श्री परमानन्द दास कह रहे हैं "श्री राधा के चरण मूर्तिमान रस स्वरूप हैं, जो श्री कृष्ण को आनंद प्रदान कर रहे हैं, जो हर क्षण उन्हीं चरणों की शरण में हैं।"

