प्रेम सरोवर छाँड़ि कैं तू - श्री प्रेमी जी

प्रेम सरोवर छाँड़ि कैं तू - श्री प्रेमी जी

(सवैया)
प्रेम सरोवर छाँड़ि कैं तू, भटके क्यों चित्त के चायन में।
जहाँ गेंदा गुलाब अनेक खिले बैठे क्यों करील की छावन में॥ [1]
'प्रेमी' कहैं प्रेम को पंथ यही रहवौ कर सूधे सुभायन में।
मन तोह मिले, विश्राम वही, वृषभान किशोरी के पायन में॥ [2]

- श्री प्रेमी जी

हे मन! प्रेम के सरोवर को छोड़कर तू क्यों संसार में भटक रहा है? जहाँ गेंदा और गुलाब जैसे सुंदर पुष्प खिले हैं, वहाँ छोड़कर तू करील की सूखी झाड़ियों की छाया में क्यों बैठा है? [1]

श्री प्रेमीजी कहते हैं कि प्रेम का मार्ग यही है—सरल और सुन्दर स्वभाव में रहना। मन को यदि सच्चा विश्राम चाहिए, तो वह केवल वृषभानु-किशोरी (श्रीराधा) के चरणों में ही मिलेगा। [2]