मुकुन्दस्त्वया प्रेमडोरेण बद्धः, पतङ्गो यथा त्वामनुभ्राम्यमाणः।
उपक्रीडयन् हादर्दमेवानुगच्छन् कृपावर्तते कारयातो मयीष्टिम्।।
- जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (4)
तुम्हारी प्रेम डोर में बंधे हुए भगवान श्री कृष्ण पतंग की भाँति सदा तुम्हारे आस-पास ही चक्कर लगाते रहते हैं, हार्दिक प्रेम का अनुसरण करके तुम्हारे पास ही रहते हुए क्रीडा करते हैं। देवि! तुम्हारी कृपा सब पर है, अतः मेरे द्वारा अपनी आराधना करवाओ।
उपक्रीडयन् हादर्दमेवानुगच्छन् कृपावर्तते कारयातो मयीष्टिम्।।
- जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (4)
तुम्हारी प्रेम डोर में बंधे हुए भगवान श्री कृष्ण पतंग की भाँति सदा तुम्हारे आस-पास ही चक्कर लगाते रहते हैं, हार्दिक प्रेम का अनुसरण करके तुम्हारे पास ही रहते हुए क्रीडा करते हैं। देवि! तुम्हारी कृपा सब पर है, अतः मेरे द्वारा अपनी आराधना करवाओ।

