महारङ्कत्वे वा परमविभवे बहुतरे सुखे वा दुःखे वा यशसि बहुलेऽवापयशसि।
मणौ वा लोष्ट्रे वा सुहृदि परमे विद्विषति वा समादृष्टिर्नित्यं मम भवतु वृन्दावनजुषः॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.56)
महा दारिद्र्य में अथवा परम विभुत्व में, महान सुख में अथवा विषम दुःख में, बहुत यश में अथवा अपयश में, मणि में अथवा मिट्टी के ढ़ेले में, परम बन्धु में अथवा परम शत्रु में, वृन्दावन वास करते हुए हमारी नित्य समान दृष्टि हो।
मणौ वा लोष्ट्रे वा सुहृदि परमे विद्विषति वा समादृष्टिर्नित्यं मम भवतु वृन्दावनजुषः॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.56)
महा दारिद्र्य में अथवा परम विभुत्व में, महान सुख में अथवा विषम दुःख में, बहुत यश में अथवा अपयश में, मणि में अथवा मिट्टी के ढ़ेले में, परम बन्धु में अथवा परम शत्रु में, वृन्दावन वास करते हुए हमारी नित्य समान दृष्टि हो।

