जाकी कृपा शुक ग्यानी भये - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (84)

जाकी कृपा शुक ग्यानी भये - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (84)

(सवैया)
जाकी कृपा शुक ग्यानी भये, अति दानी जो ध्यानी भये त्रिपुरारी। [1]
जाकी कृपा विधि वेद रचै, भये व्यास पुरानन के अधिकारी॥ [2]
जाकी कृपा ते त्रिलोक धनी, सुकहावत श्री ब्रज चंद बिहारी। [3]
लोक-घटा ते 'हठी' को बचाओ, कृपा करि श्री वृषभानु दुलारी॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (84)

श्री राधा की कृपा से शुकदेव जैसे महान ज्ञानी हुए, और उन्हीं की कृपा से शिवजी महान दानी और ध्यानस्थ बने। [1]

उन्हीं की कृपा से ब्रह्माजी ने वेदों की रचना की है और उन्हीं की कृपा से व्यास जी ने पुराणों की रचना की है। [2]

उन्हीं की कृपा से त्रिलोक के स्वामी ब्रजचंद्र (श्रीकृष्ण) 'विहारी' कहलाए, अर्थात् जो सदा विहार करते हैं। [3]

श्री हठी जी प्रार्थना कर रहे हैं—हे वृषभानु नंदिनी श्री राधा! कृपा कर इस दिन भक्त को सांसारिक प्रपंच से बचाओ, यह केवल आपकी ही शरण में है! [4]