नाम पतित पावन सुनि, निर्भय ह्वै कीय पाप।
यामें दोष बताउ मम, दोषी तो हैं आप॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (83)
मैंने “पतित-पावन” नाम सुनकर ही निर्भयतापूर्वक दिन-रात धुआँधार, बिना सोचे-विचारे, पाप किए। किंतु इसमें मेरा क्या दोष है? दोष तो आपके नाम का ही है।
यामें दोष बताउ मम, दोषी तो हैं आप॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (83)
मैंने “पतित-पावन” नाम सुनकर ही निर्भयतापूर्वक दिन-रात धुआँधार, बिना सोचे-विचारे, पाप किए। किंतु इसमें मेरा क्या दोष है? दोष तो आपके नाम का ही है।

