चकई! प्रान जु घट रहैं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (05)

चकई! प्रान जु घट रहैं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (05)

चकई! प्रान जु घट रहैं, पिय-बिछुरन्त निकज्ज।
सर-अन्तर अरु काल निशि, तरफि तेज घन गज्ज।।
तरिफ तेज घन गज्ज, लज्ज तुहि वदन न आवै।
जल-विहून करि नैंन, भोर किहिं भाय दिखावै।।
(जैश्री) हित हरिवंश विचारि, वाद अस कौंन जु बकई।
सारस यह सन्देह, प्रान घट रहैं जु चकई।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (05)

निज रसिकों के सिद्धांत एवं वृन्दावन रस के नित्य विहार में श्री राधा को स्वकीया और परकीया दोनों से पृथक माना जाता है। यहाँ एक क्षण का वियोग प्रियतम एवं प्रेयसी के प्राण हरण कर लेता है, एवं नित्य संयोग होते हुए भी नित्य उत्कंठा एवं रस  बढ़ता रहता है। श्री प्रिया प्रियतम नित्य साथ होते हुए भी ऐसे मिलते हैं जैसे इससे पहले कभी नहीं मिले एवं नित्य लीला नवनवायमान है।

व्याख्या:- सारस चकई के प्रेम की भर्त्सना करता हुआ कहता है कि हे चकई, प्रियतम के बिछड़ने पर निरर्थक बने हुये तेरे प्राण शरीर में कैसे रहे आते हैं ? बीच में सरोवर का अंत, काल की सी रात्रि, बिजली का चमकना और मेघ का गरजना सहने के बाद सवेरे आँसू पोंछकर तू अपने प्रियतम से मिलने पर किस प्रेम का प्रदर्शन करती है ? क्या तुझे अपने इस व्यवहार पर लज्जा नहीं आती? श्री हित हरिवंश कहते हैं कि यह सब विचार कर कौन व्यर्थ में बकवास करे। नित्य संयोगी सारस (नित्य विहार) के मन में तो यह संदेह है कि वियुक्त होने पर चकई के प्राण उसके शरीर में रहते ही कैसे हैं?