(राग विलावल)
यह तनु वृन्दावन जो पावै।
तौ स्वारथ परमारथ मेरौ रसिक अनन्यनि भावै।।
दासिनी की दासी करि हरि मोहि राधा-रवन दिखावै।
यह वासना जु मेरे मनमें और कछू जिनि आवै।।
पुंज पून्य ते प्रेम भक्ति रति, कुंजविहार बतावै।
सर्वोपरि रसरीति प्रीति कौ वारिधि व्यास बढ़ावै।।
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध्द (103)
इस पद में श्री हरिराम व्यास वृन्दावन धाम के वास की महिमा बखान कर रहे हैं। यदि वृन्दावन वास मिल जाये तो उसका क्या परिणाम होगा। वृन्दावन वास करके अपने स्वार्थ परमार्थ की कोई इच्छा नहीं रहती और केवल रसिक जन एवं श्री युगल अकस्मात् ही मन को भाते हैं।
स्वतः ही श्रीजी की दासी की दासी बनकर राधारमण के दर्शन का सौभाग्य मिलता है और केवल एक ही आशा रह जाती है कि युगल सरकार को निरखना, लाड़ लड़ाना एवं प्रेम से सेवा करना।
वृन्दावन धाम प्रेम भूमि है इसलिए केवल प्रेम भक्ति एवं नित्य विहार रस ही हृदय में समाता है।
वृंदावन वास एवं निज रसिकों के संग से सर्वोपरि रस रीति जो नित्य आनंद का वर्धन करने वाली है और वृन्दावन रस का आस्वादन जीव करता है ।
ध्यान दें:
यह समस्त लक्षण वास्तविक रूप से वृंदावन वास करके आते हैं यदि किसी वैष्णव एवं भक्त या वृंदावन वासी के प्रति अपराध ना हो।
यह तनु वृन्दावन जो पावै।
तौ स्वारथ परमारथ मेरौ रसिक अनन्यनि भावै।।
दासिनी की दासी करि हरि मोहि राधा-रवन दिखावै।
यह वासना जु मेरे मनमें और कछू जिनि आवै।।
पुंज पून्य ते प्रेम भक्ति रति, कुंजविहार बतावै।
सर्वोपरि रसरीति प्रीति कौ वारिधि व्यास बढ़ावै।।
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध्द (103)
इस पद में श्री हरिराम व्यास वृन्दावन धाम के वास की महिमा बखान कर रहे हैं। यदि वृन्दावन वास मिल जाये तो उसका क्या परिणाम होगा। वृन्दावन वास करके अपने स्वार्थ परमार्थ की कोई इच्छा नहीं रहती और केवल रसिक जन एवं श्री युगल अकस्मात् ही मन को भाते हैं।
स्वतः ही श्रीजी की दासी की दासी बनकर राधारमण के दर्शन का सौभाग्य मिलता है और केवल एक ही आशा रह जाती है कि युगल सरकार को निरखना, लाड़ लड़ाना एवं प्रेम से सेवा करना।
वृन्दावन धाम प्रेम भूमि है इसलिए केवल प्रेम भक्ति एवं नित्य विहार रस ही हृदय में समाता है।
वृंदावन वास एवं निज रसिकों के संग से सर्वोपरि रस रीति जो नित्य आनंद का वर्धन करने वाली है और वृन्दावन रस का आस्वादन जीव करता है ।
ध्यान दें:
यह समस्त लक्षण वास्तविक रूप से वृंदावन वास करके आते हैं यदि किसी वैष्णव एवं भक्त या वृंदावन वासी के प्रति अपराध ना हो।

