दूरे सृष्ट्यादिवार्त्ता न कलयति मनाङ्नारदादीन्स्वभक्ताञ्छ्रीदामाद्यैः सुहृद्भिर्न मिलति हरति स्नेहवृद्धिं स्वपित्रोः।
किन्तु प्रेमैकसीमां मधुररससुधासिन्धुसारैरगाधां श्रीराधामेव जानन्मधुपतिरनिशं कुंजवीथीमुपास्ते।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (235)
सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहचानते, श्रीदामा आदि मित्रों से नहीं मिलते तथा अपने माता-पिता के स्नेह को भी बढ़ावा नहीं देते, किन्तु प्रेम की परमावधि स्वरूपा तथा मधुर रस रूपी अमृत-सिन्धु के सार की अगाध आश्रय एकमात्र श्रीराधा को ही जानते हुए मधुपुर (श्री श्यामसुंदर) निरंतर कुंज गलियों की उपासना करते रहते हैं।
किन्तु प्रेमैकसीमां मधुररससुधासिन्धुसारैरगाधां श्रीराधामेव जानन्मधुपतिरनिशं कुंजवीथीमुपास्ते।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (235)
सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहचानते, श्रीदामा आदि मित्रों से नहीं मिलते तथा अपने माता-पिता के स्नेह को भी बढ़ावा नहीं देते, किन्तु प्रेम की परमावधि स्वरूपा तथा मधुर रस रूपी अमृत-सिन्धु के सार की अगाध आश्रय एकमात्र श्रीराधा को ही जानते हुए मधुपुर (श्री श्यामसुंदर) निरंतर कुंज गलियों की उपासना करते रहते हैं।

