हे वृषभानु सुते ललिते - ब्रज के सेवैया

हे वृषभानु सुते ललिते - ब्रज के सेवैया

हे वृषभानु सुते ललिते, मैंने कौन कियौ अपराध तिहारौ।
काढ दीयौ व्रज मंडल ते, औरहू दोष रह्यो कछु भारौ॥ [1]
अपने जिय जान दया की निधान, भई सो भई अब बेग सम्भारौ।
अपनो करी लेउ यही मोहि देहु, कुँज कुटी जमुना को किनारौ॥ [2]

- ब्रज के सेवैया

हे वृषभानु दुलारी श्री राधे, मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया है जिसके कारण आपने मुझे ब्रज मंडल से निकाल दिया है। निश्चय ही मुझसे कोई बहुत भारी अपराध हो गया होगा। [1]

हे करुणामयी श्री राधे! जो बीत गया, सो बीत गया। अब कृपा कर शीघ्र ही मेरी बिगड़ी बना दीजिए। मुझे अपनाकर, वृंदावन में यमुना के किनारे किसी कुंज कुटीर में वास प्रदान कीजिए। [2]