स्यामा जू के चरननि की बलिहारी - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, पद्यावली (72)

स्यामा जू के चरननि की बलिहारी - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, पद्यावली (72)

(राग मलार)
स्यामा जू के चरननि की बलिहारी।
जे हैं बसत किसोर लाल के, प्राँननि मध्य सदा री॥ [1]
विहरत कुसुम पराग लगत जब, पीत वसन लै झारत।
लुठत मयूर चंद्रिका तिन पर, अद्भुत छबिहि निहारत॥ [2]
जावक चित्र बनाइ सँवारत, करनि सफल तब मानत।
'हित ध्रुव' ते दुर्लभ सबहिनु तें, रसिक मरम पै जानत॥ [3]

- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, पद्यावली (72)

नव-किशोर श्री लाल जी के प्राणों में सदैव बसने वाले, श्री श्यामा जू के चरणों की मैं बलिहारी जाता हूँ। [1] 

जब श्री प्रिया जी अपने सुकोमल चरणों से श्री वन में विचरण करती हैं और जब उन चरणों में पुष्षों का पराग अनुरञ्जित हो जाता है, तब प्रियतम अपने पीताम्बर से उस पराग को झाड़ने पौंछने लगते हैं। इन चरणों की अद्भुत छवि को निहार कर बलिहार जाते हुए प्रियतम अपने मयूर-चन्द्रिका इन्हीं चरणों पर विलुण्ठित करने लगते हैं । [2] 

जब प्रियतम इन चरणों पर अलक्तक रङ्ग से चित्र रचना करने का सौभाग्य प्राप्त करते है, तब वे अपने हाथों की सफलता अनुभव करते हैं। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि नित्य-विहारिणी श्रीश्यामा के ये चरण अन्य सभी के लिए दुर्लभ हैं तथापि इन चरणों की महिमा एवं उनका रस- रहस्य तो केवल रसिक प्रीतम किंवा रसिक उपासक जन ही जानते है। [3]