लावण्यं परमाद्भुतं रतिकला चातुर्यमत्यद्भुतं, कान्ति: कापि महाद्भुता वरतनो लीला गतिश्चाद्भुता।
द्रगभंगी पुनरद्भुताद्भुततमा यस्य: स्मितं चाद्भुतं सा राधाद्भुतमूर्तिरद्भुतरसं दास्यं कदा दास्यति॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (118)
जिनका लावण्य परमाद्भुत है, जिनकी रति-कला-चातुरी अति अद्भुत है, जिन श्रेष्ठ वपु की कोई अवर्णनीय कांति भी महा अद्भुत है, एवं जिनकी लीला पूर्ण गति भी अति अद्भुत है। अहा ! जिनकी नेत्र- भंगिमा अद्भुत से भी अद्भुततम है और जिनकी मंद मुस्कान भी अद्भुत है, वे अद्भुत-मूर्ति श्री राधा अपना अद्भुत रस-स्वरूप-दास्य मुझे कब प्रदान करेंगी?
द्रगभंगी पुनरद्भुताद्भुततमा यस्य: स्मितं चाद्भुतं सा राधाद्भुतमूर्तिरद्भुतरसं दास्यं कदा दास्यति॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (118)
जिनका लावण्य परमाद्भुत है, जिनकी रति-कला-चातुरी अति अद्भुत है, जिन श्रेष्ठ वपु की कोई अवर्णनीय कांति भी महा अद्भुत है, एवं जिनकी लीला पूर्ण गति भी अति अद्भुत है। अहा ! जिनकी नेत्र- भंगिमा अद्भुत से भी अद्भुततम है और जिनकी मंद मुस्कान भी अद्भुत है, वे अद्भुत-मूर्ति श्री राधा अपना अद्भुत रस-स्वरूप-दास्य मुझे कब प्रदान करेंगी?

