निहं हिंदू नहिं तुरक हम - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, , अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

निहं हिंदू नहिं तुरक हम - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, , अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

निहं हिंदू नहिं तुरक हम, नहिं जैनी अंग्रेज।
सुमन सम्हारत रहत नित, कुंजबिहारी सेज।।
कुंजबिहारी सेज छाँड़ि, मग दच्छिन डेरौ।
रहै बिलोकत केलि, नाम भगवत अली मेरौ।
श्रीललिता सखि पाय कृपा सेवत सुख स्यामहिं।
नहिं काहू सौं द्रोह, मोह काहू सौं है नहीं ।।

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

भावार्थ - न तो हम हिन्दू हैं, न तुर्क (मुसलमान), न जैनी न अंग्रेज। प्रेम पथ का पथिक होने के बाद हमारी वे सब पहचानें और क्रियाएं मिट गई है, जिनमें सांसारिक लोग उलझे रहते है। दुनिया में दक्षिण अथवा वाम कहे जाने वाले समस्त व्यवहार मांगों  को त्यागकर हम तो बस प्रिया प्रियतम की सुमन सेज सँभालते रहते हैं और इसी नित्य जोड़ी की रस केलियों का सतत अवलोकन किया करते हैं। इसी कारण हमारा नाम "भगवत अलि" पड़ गया है। ललिता सखी की कृपा से ही हमें नित्य बिहार के सुख सेवन का यह अद्भुत सौभाग्य मिला है और इसी का सेवन हम निरंतर करते रहते है। ऐसी स्थिति में हमारे भीतर न किसी के प्रति ईर्ष्या द्वेष आदि (प्रतिकूल) भाव बचे हैं, न किसी के प्रति मोह ममता आदि के (अनुकूल) भाव ही शेष रह गये है।