प्रगट्यो सब व्रज को सिंगार - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (49)

प्रगट्यो सब व्रज को सिंगार - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (49)

(राग सारंग)
प्रगट्यो सब व्रज को सिंगार।
कीरती कूख अवतरी कन्या सुन्दरता को सार॥
नखसिक रूप कहाँ लों बरनो कोटिक मन बलिहार।
परमानन्द वृषभानु नन्दनी जोरी नंददुलार॥

- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (49)

ब्रज की सम्पूर्ण श्रंगार श्री राधाजी प्रकट हुई हैं। वह श्री कीर्ति जी के कोख से प्रकट हुई हैं और सम्पूर्ण सौंदर्य की सार हैं। इनके चरण नख से सिर के केश तक किसी भी अंग के स्वरुप का वर्णन करना असंभव है, भले ही करोड़ों मन वर्णन के कार्य में लगा दिया गया हो। कवि परमानंददास अब कहते हैं "श्री वृषभानुजी की इस बेटी में सबसे उत्कृष्ट रस एवं परम आनंद सन्निहित है और नंद नंदन के साथ इनकी जोड़ी अति सुन्दर शोभा को प्राप्त हो रही है।"