निज स्वारथ के मित्र सब, यही जगत की चाल।
नारायण बिन स्वारथी, हितू नंद को लाल॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (39)
जगत में समस्त व्यक्ति प्रायः स्वार्थवश ही मित्र बनते हैं; परंतु जो बिना स्वार्थ के प्रेम और मित्रता करता है, वह एकमात्र नंदलाल श्रीकृष्ण ही हैं।
नारायण बिन स्वारथी, हितू नंद को लाल॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (39)
जगत में समस्त व्यक्ति प्रायः स्वार्थवश ही मित्र बनते हैं; परंतु जो बिना स्वार्थ के प्रेम और मित्रता करता है, वह एकमात्र नंदलाल श्रीकृष्ण ही हैं।

