छवि ठाड़ी कर जोरे, रूप कला चौर ढोरैं - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (39)

छवि ठाड़ी कर जोरे, रूप कला चौर ढोरैं - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (39)

(कवित्त)
छवि ठाड़ी कर जोरे, रूप कला चौर ढोरैं,
दुति सेबैं तन गोरे रति बलि जात है। [1]
उजराई कुँज ऐन सुथराई रची सैन,
चतुराई चितै नैन अति ही लजात है॥ [2]
राग सुनि रागिनी हू होत अनुराग बस,
मृदुताई अंगनि छूवत सकुचात है। [3]
हितध्रुव सुकुमारी पूतरीन हूते प्यारी,
जब जब देखें बिहारी सुख बरसात है॥ [4]

- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (39)

छवि मूर्तिमान होकर श्री राधारानी के समक्ष हाथ जोड़े खड़ी है, और रूप एवं कला उनके लिए चँवर ढुला रहे हैं। घन-दामिनी श्री राधा के अंग को प्रकाशित कर सेवा में रत है, और रति स्वयं को उन पर न्योछावर कर रही है। [1]

उज्ज्वल प्रकाश पूरे कुंज को आलोकित कर रहा है, और पवित्रता निकुंज के शयन कक्ष को पवित्र बना रही है। चतुराई श्री राधा के नयनों की चितवन में समर्पित है, परंतु उनके समक्ष स्वयं को लज्जित पाती है। [2]

श्री राधा रानी की राग-पूर्ण वाणी को सुनकर स्वयं रागिनी उनके प्रेम के वश में हो गई है, और मृदुता एवं कोमलता भी श्री राधा के अंगों को स्पर्श करने के लिए सकुचा रही हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कह रहे हैं कि "श्री श्यामसुंदर को श्री राधा इतनी अधिक प्रिय हैं जितना प्रेम पुतलियाँ आँखों से करती हैं। जब श्री नंदनंदन श्री राधा को निहारते हैं, तब समस्त प्रकृति में सुख और प्रेम की वर्षा होने लगती है।" [4]