हरि रसना राधा-राधा रट - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (21)

हरि रसना राधा-राधा रट - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (21)

हरि रसना राधा-राधा रट।
अति अधीन आतुर जद्यपि पिय, कहियत है नागर नट॥
संभ्रम द्रुम, परिरंभन कुंजन, ढूँढ़त कालिन्दी-तट।
विलपत, हँसत, विषीदत, स्वेदित सतु सींचत अँसुवनि वंशीवट॥
अंगराग परिधान वसन लागत ताते जु पीतपट।
(जैश्री) 'हित हरिवंश' प्रसंशित श्यामा, दै प्यारी कंचन-घट॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (21)

भूमिका- इस पद में श्री श्यामसुंदर के उत्कट विरह का वर्णन है। सूरदास जी, नन्ददास जी आदि रसिक महानुभावों ने सर्वत्र श्री राम एवं गोपी जनों के विरह के वर्णन उपस्थित किये हैं इसके विपरीत श्रीहिताचार्य ने अपनी ब्रजभाषा रचनाओं में कहीं भी श्रीराधा के विरह का वर्णन न करके श्रीश्यामसुन्दर के विरह-ताप का ही वर्णन किया है।

व्याख्या:- श्रीहरि की रसना राधा-राधा रट रही है। वे यद्यपि नागर और नट कहलाते हैं फिर भी और प्रिया से मिलने के लिये सदैव अधीर और आतुर बने रहते हैं। (नागर नट से तात्पर्य उस चतुर नायक से है जो अनेक नायिकाओं से प्रीति करके भी कहीं बँधता नहीं है।)

(अब श्रीराधा के विरह में उनकी करुण स्थिति का वर्णन करते कहते हैं) वे श्रीवृन्दावन के वृक्षों को देखकर भ्रम में पड़ जाते हैं, वहाँ फूली हुई कुजों को श्रीप्रिया समझकर उनका आलिंगन करते हैं एव यमुना तट पर श्रीश्यामा को ढूंढते फिरते हैं। वे श्रीराधा के विरह में विलाप करते हँसते हैं, निराशा से दुखी होते हैं, श्रमजल युक्त बनते हैं, (उनको पसीना आता है) एवं अपने आँसुओं से बंसीवट को सींचते हैं ।

(जो श्यामसुंदर वंशी नाद के द्वारा वंशीवट का सिंचन करते हैं वे ही आज श्रीराधा के विरह में, उसको हरा-भरा रखने के लिये, उसे अपने आँसुओं से सींच रहे हैं।)

अंग राग और पहनने के वस्त्र (पीतपट आदि) श्री राधा के विरह में नन्दलाल को अग्नि के समान गरम जान पड़ते हैं। श्री हित हरिवंश श्रीश्यामा के (उदारता आदि गुणों की) प्रशंसा करते हुये प्रार्थना करते हैं कि हे प्यारी, अपने प्रियतम के विरह ताप की शान्ति के लिये कंचन घट (रस पूर्ण युगल उरोज) प्रदान कीजिये।

(यहाँ उरोंजों के लिये 'कंचन घट' का प्रयोग साभिप्राय है क्योंकि
ताप की शांति जल पूर्ण घट से ही उठाया है।)।