नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं  - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (03)

नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (03)

नहिं निर्गुन, सर्गुन नहीं, नहिं नेरे नहिं दूरि।
भगवत रसिक अनन्य की, अद्भुत जीवन मूरि॥

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (03)

वह (नित्य-विहार-रूपी अद्भुत वस्तु) न निर्गुण है, न सगुण; बल्कि दोनों से विलक्षण है। न वह पास है, न दूर—प्रेमियों के लिए वह सर्वत्र है, किंतु प्रेम-विहीन के लिए वह कहीं भी नहीं है। भगवत रसिकजी कहते हैं कि यही अद्भुत वस्तु रसिकजनों की प्राण-संजीवनी है।