स्वेद परी शारदा निहारि जाके अंगन कौ - श्री जयदेव जी

स्वेद परी शारदा निहारि जाके अंगन कौ - श्री जयदेव जी

(कवित्त)
स्वेद परी शारदा निहारि जाके अंगन कौ,
रमादुरी विष्णु हिये लाज धरि मन में। [1]
प्रीतम की प्रीत कौ बनाय ब्याज आधी धसि,
उमाहूँ प्रवेश कियौ चाहै शंभु तन में॥ [2]
कवि जयदेव रति रंभादिक रंक कौन,
और न अनूप एसी देखी तियगन में। [3]
रूप की निधान वृषभानु सुता सिन्धु रूप,
ताके एक सीकर कौ रूप त्रिभुवन में॥ [4]

- श्री जयदेव कवि जी

जब सरस्वती श्री राधा के रूप को निहारती हैं, तो उनके बदन पर पसीने की बूँदें छलक जाती हैं, और लक्ष्मी स्वयं को इतनी लज्जित पाती हैं कि वह भगवान विष्णु के वक्षस्थल में छिप जाती हैं। [1]

उमा, यह जानकर कि उन्हें भगवान शिव से जो प्रेम मिलता है, वह श्रीकृष्ण के प्रेम का आधा भी नहीं है, तो वह शंभु के शरीर में ही छिप जाती हैं। [2]

कवि जयदेव अब कहते हैं, "रति और रंभा जैसी सुंदर अप्सराएँ समझती हैं कि उनके पास श्री राधा के सौंदर्य की तुलना करने योग्य कुछ भी नहीं है। तीनों लोकों में उनके समान कोई अन्य नहीं है।" [3]

श्री वृषभानुजी की यह लाडली किशोरी प्रेम की निधि है और भव्यता का सागर है। उनके सौंदर्य की मात्र एक बूंद से ही तीनों लोकों में समस्त सौंदर्य उत्पन्न हुआ है। [4]